महावीर वाणी · भाग 2 · Chapter 1

महावीर वाणी-(भाग-02)-ओशो

Osho  ·   · 
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महावीर वाणी भाग—2 (ओशो)

(द्वितीय एवं तृतीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला के अंतर्गत दिनांक 13 सितम्‍बर से 21 सितम्‍बर 1972 एवं 25 अगस्‍त से 11 सितम्‍बर 1973 तक भगवान श्री द्वारा दिए गये 27 अमृत प्रवचनों का संकलन)

मैं यहां एक अनूठा प्रयोग कर रहा हूं, जैसा कभी नहीं किया गया है। यह मनुष्‍य जाति के इतिहास में पहली घटना है। जहां सारे धर्म एक साथ डूब रहे है। और बिना किसी प्रयास के यहां बैठकर हम दोहराते नहीं कि अल्‍लाह ईश्‍वर तेरा नाम, सबको सन्‍मति दे भगवान। यह हम दोहराते नहीं परंतु यहां ये घट रहा है। यहां अल्‍लाह और ईश्‍वर एक के ही नाम है। इसे कहने की जरूरत नहीं है। हुए जा रहे है एक। यहां किसी को पता नहीं चलता। कौन हिंदू है। कौन मुसलमान है, कौन ईसाई है, कौन यहूदी है, कौन सिख है। यहां सब इकट्ठे है।

और सारे जगत की सम्पदा मेरी है। मैं आध्‍यात्‍मिक सम्‍पदा का अपने को हकदार घोषित करता हूं, उसमें जरा भी कुछ छोड़ने को राज़ी नहीं हूं, क्‍यों उसे छोटा करूं। पूरा मनुष्‍य जाति का इतिहास मेरा है। और यही मैं चाहता हूं। कि तुम्‍हारा भी हो जाये। इस लिए तुम ये बातें हीं छोड़ दो—भारतीय और गैर भारतीय। तुम्‍हें यह फिकिर ही मिट जानी चाहिए। ये चमड़ी के रंग और ढ़ंग, इन पर तुम ध्‍यान न दो। ये आदते गलत है। ये संस्‍कार ओछे है। इनका विदा करो।

मनुष्‍यता एक है और यह पृथ्‍वी एक हो जाये, तो शांति हो, तो सौमन्‍यस्‍यहो तो एक भाइचारा हो, एक प्रेम जगे और जगत के न मालूम कितने कष्‍ट अपने आप समाप्‍त हो जायें।

ओशो